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जगतहितकाऱणी
परन्तु जबकि इनके जाल की खबर संसार को हुई जब तमाम संसार ने एक दिल होकर हरनाकुश के पाप को दफे किया जब संसार की औलाद सलामत रही, नहीं तो उम्मेद नहीं थी कि जो रावण के पाप से दुनिया बचती, क्योंकि रावण की औलाद ज्यादा रह जाती और संसार की औलाद कम रह जाती तो बेशक संसार की औलाद कम होने की वजह से रावण राज कर लेता, और जो दिल में आता वोह अपने राज में रकता और संसार के लोगों को दुख देता तो फिर संसार किसके आगे जाके दुख रोता कि हमको रावण वगैरा दुख देता हैं सो हमको मदद देके छोडाओ, क्योंकि रावण ने चार कूंट और चौदा भांण में राज करने के सबब से राक्षस विद्या का पाप चलाया है, और सब राजा बादशाहों को और रैयत को अपने राक्षसी पाप से गारत कर देता, जब तमाम जहान के लोग कम रह जावेंगे और हम ज्यादा होंगे जब हम अपने दिल में जो विचारेंगे वहीं करेंगे। सो रावण वगैरा इस तरह का ख्याल करके दिल में लाते थे, और दिल में क्या चाहते थे! परन्तु शनिचरजी महाराज ने सब संसार को रावण के जाल से वाकिफ कर दिया इससे कुल जहान बच गया और बचने के सबब से तमाम जहान ने अपनी जबान से यह शुक्रिया अदा किया कि शनिचरजी महाराज का जुग-जुग और भो-भो भला हुजीयो, कि हमको रावण के जाल से बचाया, जिसकी यह है कि शनिचर ने रावण के जील से कुल जहान को वाकिफ किया था, जब दुनिया ज्यादा थी और रावण की औलाद कम थी। इससे संसार ने एक दिल होकर रावण के राक्षसी पाप को छोड़ाया और जो रावण संसार के नाम का पाप कराके गारत कर देता, जब तो संसार में चोरी प्रगट नहीं होती तो रावण चार कूंट में अपना राज करता, तो फिर संसार रावण के नीचे से हरगिज-हरगिज नहीं निकलता बलके डूबा हुआ रहता, चाहे फिर वोह ‘अमल-फाँसी’ खा करके ही मरते तो भी नहीं मरने देता, क्योंकि रावण की कुल तो ज्यादा रह जाती और संसार की कुल कम रह जाती तो फिर संसार को बड़ा भारी दुख हमेशा के वास्ते रह जाता और संसार का कुल कम रह जाता, जब ऐसा रावण करता; सो यह तो संसार के बड़ेभाग कि जो रावण की चोरी मालूम हो गई, तो सातों आठों विलायतों के लोग एक दिल हो करके और समझके रावण की औद तक को मार दिया कि, “चो रावण के घर में चिराग करने वाला ही नहीं.” इससे फिर संसार के नाम का पाप करने वाला भी कोई नहीं रहा, क्योंकि संसार तो रचना है। इससे जिन-2ने कि राक्षस-विद्या का पाप संसार को गारत करने के वास्ते चलाया था, सो उन्हों की औलाद तक को ही नहीं रखा है और रावण ने जो राक्षस विद्या का पाप चलाया था वोह संसार को जाहिर करके थोड़ा ही चलाया था, क्योंकि जो जाहिर कराता तो करने कौन देता? सो सच बात है कि जान के अपने बच्चों को कौन गारत होने देता? परन्तु खबर नहीं थी इससे जहान को गारत किया, व रावण का शनिचर को राक्षसी पाप करना थोड़ा ही मालूम था? बलके शनिचर को खुद ही ग्रह चाले के पाप से बाँध रखा था; सो शनिचर के नाम का पाप रावण, चौरासी लाख कुण्डियों के उपर कराता था और शनिचर को ऐसा सुझाया कि मुझको नारगी में डाला है और ग्रह देवता सजा दे रहै है, और जोकि अगले जमाने के भगत लोग होकर मर गये हैं उनका सुपना शनिचर को कराके सुझा देता था जब शनिचर ने दिल में सोचा कि जीता हुआ शख्स कोई, मुझको मारने को आवे तो मैं देखूं कि मरे हुए के सुपने मुझको किस तरह से आते हैं, क्योंकि जो मर गये है उनके तो नाम अमर रहे हैं, सो यह ख्याल करने की बात है कि जो मर हगये है वोह किस तरह से चौरासी लाख कुण्डियों पर जीवों को मारते है? और किस तरह से पाप कराते है? क्योंकि मरे हुए से तो कुछ भी नहीं होता है; हाँ! जिन्दा तो पाप से अलबत्ता कर सकते है, सो वोह पाप करें तो उनकी चल जाती है परन्तु मरे हुए पाप किस तरह से करा सकते है, जब दिल में विचार किया कि जो मरे हुए सुझाते है और ग्रह कराते है, सो यह तो अपने को भूल बताई है कि इस तरह से हमारा जाल मालूम नहीं होगा, परन्तु यह पाप रावण की तरह से चलाया हुआ है चब से दुनिया में टीपणा वगैरा और ‘नाईत्तफाकी’ वगैरा होना शुरु हुआ है और रावण ने राक्षस विद्या के वेद और किताबें बना करके चलाई थी उनकी पहचान शनिचर ने की, कि वेद असली नहीं है और जाल के है; क्योंकि उनको दुनिया बांचती थी और कानों से सुनती थी क्योंकि टीपणों वगैरा को ऋषिश्वर लोग तमाम जहान में बांचते फिरते थे परन्तु जब तक कि शनिचर को राक्षसी पाप से नहीं कलपाया था,
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