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जगतहितकाऱणी
जब फिर दुनिया के नाम का पाप करना शुरु कर देते है, सो इस राक्षसी पाप से जमीन माता दुख पाती है। सो वेद-पुराणों में भी लिखा है और सब संसार के लोग भी कहते है कि जमीन माता के नाम का राक्षस विद्या का पाप कराते है जिससे जमीन माता दुख पाती है, और पाप की वजह से रिजक वगैरा भी पूरा नहीं होता है और ना पूरी-पूरी वनास्पति होती है, इससे तमाम दुनिया दुख पाती है, बलके जमीन माता भी इस राक्षस विद्या के पाप से दुबली हो गई है और उसके शरीर की चरबी भी गल गई है। सो चरबी जमीन के शरीर में इन चीजों को कहते हैं कि जिसको फी जमाना चाँदी-सोने की खानें बोलते हैं वोह जमीन माता के शरीर की चरबी है परन्तु राक्षस विद्या का पाप चलाया है, उस पाप से जमीन माता के शरीर की चरबी गल गई है; और पहले राजा रावण ने राक्षस विद्या का पाप चलाया था, तो किसी ने एक पीढ़ी तक चलाया था और किसी ने दो पीढ़ी तक चलाया था परन्तु जबकि राक्षस विद्या की खबर दुनिया को पड़ी जब दुनिया ने उन्हों को सजा दी और सजा देकर उनकी राक्षस विद्या को छोड़ा दिया, जबसे जमीन माता दुबली नहीं हुई, और रावण के जमाने तक चाँदी-सोने की खानें मौजूद थी सो रावण ने तो संसार के लोगों की अकल थोड़ी भ्रष्ट की थी सो जब पाप कराता था जब दुनिया के लोग फौरन समझ जाते थे, और जबकि दुनिया के नामका पाप कराता था और दुनिया की अकल थोड़ी खराब हो जाती थी, तो दुनिया के लोग उसी वक्त समझ लेते थे कि कहीं राक्षसी पाप हम लोगों के नाम का हो रहा है जिससे हमारी अकल फिरी हुई है, तो संसार के लोगों ने अपनी अकल को खराब देखकर और एक दिल होकर फौरन राक्षसी पाप को छोड़ा दिया परन्तु इन सौदागरांन ने भी बलराजा के बाद से राक्षस विद्या का पाप चलाया है। सो यह महाजन लोग तो अपने पाप को समझते है कि राक्षसी पाप से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, सो एसा समझ करके इन सौदागर महाजनांन ने रावण, हरनाकुश वगैरा से भी बढ़कर राक्षस विद्या का पाप चलाया है और साफ बुद्धि भ्रष्ट कर दी है; और जमीन के उपर जो खानें थी वोह जमीन के शरीर की चरबी थी परन्तु अब जमीन माता बिलकुल दुबली हो गई है और बलराजा के बाद से राक्षस विद्या चल रही है और बलराजा को मरे हुए का हाल ना मालूम कि किस कदर अरसा हुआ जब से यह बनिये पाप करा रहे है और रावण, हरनाकुश वगैरा तो पाप करने से डरते थे कि जो हम ज्यादा पाप करावेंगे तो हमारी औलाद को लगेगा, इससे उन्होंने थोड़ी-2 बुद्धि भ्रष्ट करी थी और इनके जमाने में तो ऐसी बुद्धि भ्रष्ट कर दी है कि जमीन माता के शरीर की भी पहचान नहीं रही है, इससे मैं बार-बार लिखता हूँ कि इस जमाने के लोगों की ऐसी बुद्धि भ्रष्ट कर दी है कि जो आप लोग समझाने से भी नहीं समझते हो, सो इस बात का खयाल करना चाहिए कि जब राक्षस विद्या का पाप छुट जावेगा जब जमीन माता फिर ताजा हो जावेगी, और जो कि चाँदी-सोने की खानें गल गई है वोह पीछे प्रगट हो जावेगी और जिस तरह से कि आदमी बीमार होता है और फिर उसको आराम हो जाता है जब वो शख्स खाना पीना अच्छी तरह से खाता पीता है तो फिर मोटा ताजा हो जाता है, सो जबकि यह महाजन लोग जमीन माता के नाम का पाप नहीं करावेंगे तो जमीन माता की बीमारी हट जावेगी और होले-2 जमीन माता ताजा हो जावेगी, जब धान वगैरा भी बगेर बोये हुए के पैदा होने लगेगा और चाँदी-सोने की खानें भी संसार के लोगों को दिखने लगेगी, और जब दुनिया के नाम का पाप करना छोड़ देंगे जब राजा बादशाह को रैयत देख के खुश होगी और हैयत को देख के राजा बादशाह खुश होंगे और सब संसार के लोग मोहब्बत से रहेंगे और कच्ची उमर में नहीं मरेंगे और पूरी उमर पाकर मरेंगे और जब तक कि जिन्दा रहेंगे किसी किसम की बीमारी नहीं पावेंगे, सो सब हिन्दू-मुसलमान, अंग्रेज और सातों-आठों विलायतों के बादशाहों को इस बात का ख्याल करना चाहिए कि इस तरह का हाल दुनिया में बरतेगा जब यह जानना चाहिए कि महाजनांन ने राक्षस विद्या छोड़ दी है और “पहले के जमाने में राक्षस विद्या नहीं थी जब दुनिया में सतजग था, जब दुनिया में सिंह और बकरी शामिल चरती थी ऐसा सम्प था, सो जब क्या मालिक दूसरा था? और अब क्या मालिक और ही है?” परन्तु मालिक तो वोह का वही है और मालिक ऐसा नहीं है कि जो गरीबों की अकल खराब कर देवें,
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