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जगतहितकाऱणी
से जमीन माता दुख पाती है इससे जमीन के उपर धान वगैरा नहीं होता है, जब दुनिया भूखे मरने लगती है; और पहले जमाने में जमीन माता दुख नहीं पाती थी मेवा-मिष्टान रिजक वनास्पति वगैरा वहोत होती थी कि जिसकी वजह से गरीब-गुरबा जग कर लेते थे, परन्तु पहले जमाने का सा धान अब नहीं होता है और ना अब पहले जमाने का सा बिकता है, जिसकी खास वजह यह है कि जमीन माता बीमारी के सबब से पानी कम पीती हैं जिससे मेवा मिष्टान वगैरा कम होता है, और जैसे कि झाड़ दरखत पहले जमाने में होते थे वैसे अब नहीं होते हैं, क्योंकि जमीन माता अच्छी तरह से पानी नहीं पीती है इससे अब दरखत भी लम्बे और चौड़े नहीं होते है मगर अपने बुजर्गो के देखने में तो रिजक और वनास्पति वगैरा इस कदर होती थी और अलावा इसके बलराजा के जमाने में तो बगैर खेती किये और बगैर बोये इस कदर धान होता था कि जिसका कुछ अन्दाज नहीं हो सकता था, तो पहले जमाने के गरीब लोग वगैरा भी जग कर लेते थे तो भी करजदार नहीं होते थे। सो इसको सबूत वेद और पुराणों में साबित है परन्तु इस जमाने के तो राजा बादशाह एक रजवाड़े की रैयत को भी खाना नहीं खिला सकते हैं, सो यह हाल सब तुम अपनी-2 आँखों से देख रहे हो कि अब ऐसा जमाना आ गया है कि सिवाय खार-ऐंखार के और कुछ नहीं सुझता है क्योंकि पहले जमाने में इस कदर रिजक होता था, तो पहले जमाने में हर एक जात का आदमी जग कर लेता था तो उस् जमाने के राजा बादशाह भी जग कर लेते थे तो कौनसी अचरज की बैत थी? परन्तु बलराजा के बाद से इन बनियों ने इन्द्रजाल का पाप चलाया है जिससे जमीन माता दुख पा रही है और जबकि जमीन माता पेट भरके पानी पीती थी तो रिजक भी बहोत होता थे, सो इन बातों का सबूत वेद और पुराणों में लिखा है मगर हम तुम लोग इन्द्रजाल के पाप से अन्धों के मुवाफिक है, और अपने पेट में जो कीड़े हैं सो वोह अपने पेट में कौनसी खेती करते हैं परन्तु जब हम तुम लोग खाना खाते है जब मोह भी अपना पेट भर लेते हैं इसी तरह से हम तुम और तमाम जीवाजून जमीन माता के पेट में कीड़ों की तरह से हैं, लेकिन जमीन माता इस कदर बड़ी है कि जिसका कुछ अन्दाज नहीं हो सकता है फिर इसके पेट में किस बात का टोटा था, मगर बलराजा के बाद से इन सौदागर महाजनांन ने इन्द्रजाल का पाप करना शुरु किया है जिससे दुनिया का बुरा होता है, लेकिन रावण के पहले इन्द्रजाल का पाप नहीं होता था और ना पहले कोई राक्षसी पाप को समझता था, परन्तु राक्षसी पाप रावण के वक्त से ही शुरु हुआ है, क्योंकि रावण ने दो चार मरतबा ग्रहण डाल के अन्दाज देखा था परन्तु यह बनिये लोग अपने राक्षसी पाप से साल-ब-साल ग्रहण डालते हैं कि जो टीपणों के अन्दर हंमेशा ग्रहण पड़ने का हाल लिखा हुआ आता है, सो यह टीपणे बनियों के चलाये हुए हैं कि जिस तरह से रावण ने चलाये थे, सो यह हाल सब संसार के लोग अपनी-2 आँखों से देख रहे हैं परन्तु ग्रहण पड़ने से जमीन माता निहायत दरजे का दुख पाती है इससे कोइ चीज जमीन माता के उपर उमदा तौर पर नहीं होती है, क्योंकि पहले जमाने में आदमी खेती बाड़ी वगैरा नहीं करते थे तो बगैर खेती किये हुए के ही धान वगैरा पैदा होता था, परन्तु खेती-बाड़ी का पाप भी बलराजा के बाद से ही हुआ है कि जिस दिन से इन्होंने काल पड़ाना शुरु किया है; अगरचे जमीन माता पेट भर के पानी पी लेवे और सौदागर महाजनांन को खबर पड़ जावे तो यह बनिये जमीन माता को बदहजमी का रोग जादू से करके फल-फूल वगैरा गला देते है जिसकी वजह से फिर चीजें वगैरा होवे ही नहीं, क्योंकि कुल जहान की अकल इन सौदागर महाजनांन ने अपने राक्षसी पाप से खराब कर दी है, चाहे बारिश अच्छी तरह से नहीं हुई होवे तो भी दुनिया के लोग यह कहने लगते हैं कि बारिश बहुत हुई हैं इससे फल-फूल वगैरा गल गये हैं और इन्द्रजाल के पाप से जानवरों का भी यह बनिये ज्यादा सजा देते है और चौरासी लाख जीवाजून को हद से ज्यादा सजा देते हैं जिससे बुरा होता है, क्योंकि यह बनिये जादू से चौरासी लाख जीवाजून को मारते हैं जिसको पाप बहोत होता है और खेती-बाड़ी में तो जीवड़ों को थोड़ा कलपाते है और इन्द्रजाल के पाप में जीवड़ों को ज्यादा दुख देते हैं, इससे ज्यादा पाप का नाम जादू कहते है। इससे इन बनियों का नाम ‘जादू खोरा’ रख दिया है क्योंकि यह जादूखोरा जमीन के नाम का पाप कराके जमीन में आग भी लगा देते हैं
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