तमाम जहान के चौपाये व पंखेरु और मय आदमियों के तकलीफ पाते है, इसी तरह से जमीन माता भी इन्द्रजाल के पाप से बीमारीयाँ पा रही है कि जिस तरह से आदमी को बीमारी होती है और वोह बीमारी के सबब से दुबला हो जाता है और चरबी गल जाकी है और खून सुख जाता है, उसी तरह से जमीन माता भी राक्षस विद्या के पाप से बीमारी के सबब से दुबली हो गई है, क्योंकि गोस्त और चरबी वगैरा गल गई है जिसकी वचह यह है कि जमीन माता सिर्फ जल का ही आहार करती है। सो अब जमीन माता के पेट भरने के काबिल जल नहीं बरसता है इससे दुखी है क्योंकि जैसा मेह बरसता है जब जमीन माता जल को पीती है, जब मेवा मिष्टान रिजक वनास्पति वगैरा अच्छी तरह से होती है, जब सब जीवाजून पलती है; इसी तरह से आदमी भी रिजक वगैरा खा-पीकर पलते है, मगार जमीन माता कौनसा पाप करती है जिससे अब पहले का सा रिजक वगैरा नहीं होता है? क्योंकि जमीन माता तो ऐसी सती है कि सिर्फ जल का ही आहार करती है, कि जमीन माता जल का आहार अब करती है कि जब जल बरसता है, सो सब जहान के लोग अपनी-अपनी आँखों से देखते ही हैं कुछ मेरे कहने की जरुरत ही नहीं है, और यह बनिये जबकि जमीन माता के नामका पाप कराते है जब जमीन माता बीमार हो जाती है सो जिस तरह से कि आदमी बीमारी के सबब से खाने-पीने का आहार वगैरा कम करता है, सो जबकि कम बरसता है जब दुनिया अपने मुँह से काल-2 कहती है, परन्तु यब बनिये जमीन माता के नाम का पाप कराते हैं जिससे जमीन माता बीमार हो जाती है और जिस तरह से कि मालिक ने आदमी के शरीर में गोस्त, हड्डी, चरबी वगैरा बनाई है उसी तरह से जमीन माता के शरीर में गोस्त, चरबी, हड्डी वगैरा बनाई है; लेकिन यह जो पहाड़ है तो यह जमीन माता के शरीर के हाड़ है, और जो कि मिट्टी है वोह जमीन माता के शरीर का गोस्त है और जो कि चाँदी-सोने की खानें है वोह जमीन के शरीर की चरबी है, परन्तु इन सौदागर महाजनांन ने बलराचा के बाद से राक्षसी पाप चलाया है और बलराजा के बाद से ही काल पड़ाने लगे है, और जब काल पड़ता है जब जमीन माता बीमार होती है जो बीमारी के सबब से दुबली हो गई है, जिससे जमीन माता के शरीर की चरबी गल गई है जिससे जमीन माता बिलकुल दुबली हो गई है, और जिस तरह से कि आदमी बीमार होता है और उसके शरीर की हड्डी, गोस्त और चरबी वगैरा बीमारी के सबब से गल जाती है तो बीमारी की वजह से ना ताकती भी हो जाती है, तो इसी तरह से अब जमीन माता भी बीमारी के सबब से ना ताकत हो गई है और चरबी वगैरा गल गई है और जो कि नो ही धातु की खानें सुनी जाती थी वोह जमीन माता के शरीर की चरबी थी, जिसको चाँदी-सोने की खानें बोलते हैं वोह ना तो अंग्रेजों की विलायत में मौजूद है और ना दूसरी विलायतों में है। इसी तरह पर अब इन बनियों के जाल की वजह से सातों- आठों विलायतों के अन्दर चाँदी-सोने की खानें नहीं है, और जो कहीं पर है भी तो पहले जमाने के बराबर धन नहीं निकलता है बलके ज्यादा लागत के सबब से नुकसान उठाना पड़ता है, क्योंकि पहले जमाने में एक रुपया खर्च किया जाता तो कई रुपयों का माल निकलता था और अब एक रुपया खरच किया जाता है तो लागत के दाम भी वसूल नहीं होते हैं, सो यह वजह इन्द्रजाल की है जिससे चाँदी-सोने की खाने नहीं है और अलोप हो गई है, और यह सातों-आठों विलायतें इस जमीन माता के पेट में आबाद है, परन्तु जमीन के नाताकत होने का भी सबब है कि इन सौदागर महाजनांन का राक्षसी पाप चल रहा है जिससे चाँदी-सोने की खानें “आकाश-पाताल” में भी नहीं रही है, क्योंकि जब आदमी बीमार होता है और बीमारी के सबब से उसका कुल शरीर दुबला हो जाता है परन्तु जिसको बीमारी होती है उसके शरीर की चरबी गल जाती है तो फिर उसके शरीर में ताकत कहाँ से रहती है, बलके इस काबिल हो जाता है कि दूसरे शख्स की भी आस रखता है। सो अब इसी तरह से जमीन माता भी राक्षस विद्या के पाप से दुबली हो गई है परन्तु इन सौदागर महाजनांन ने बलराजा के बाद से राक्षस विद्या का पाप चलाया है जब से जमीन माता के नामका पाप कराते है सो जबकि जमीन माता के नाम का पाप ज्यादा कराते हैं तो काल भी पड़ जाता है और ग्रहण भी पड़ जाता है, क्योंकि पाप से जमीन माता दुख पाती है इससे जमीन के उपर धान वगैरा नहीं होता है, |