हालांकि ऐस-ऐसे भारी रोग है कि जिसका कुछ हिसाब भी नहीं हो सकता है, बलके रतनागर सागर को भी देखिये कि उसको कैसा भारी रोग किया है कि जो तमाम जल समुद्र का खारा जहर कर दिया है, और दुनिया के भुलाने के वास्ते यह कैसा जाल चलाया है कि समुद्र में जो जल खारा हो गया हौ वोह रामचन्द्रजी महाराज के सराप से हुआ है। सो देखो भाई, किया तो इन सौदागर महाजनांन ने है और नाम रामचंद्रजी महाराज का बदनाम करते है कि उन्होंने किया है, यह बात बिलकुल खिलाफ है क्योंकि जल तो बड़ा है और ‘तीरनतारन’ है और रामचंद्रजी की पैदायश तो इसी तरह से है कि जिस तरह से हम और तुम और सब जहान के लोग पैदा हुए हैं, इसी तरह से जल की पैदायश रामचंद्रजी भी है और जल तो दीनदयाल है और जगत का तारने वाला है और कुल जल की ही माया है, परन्तु जल के खारा होने का यह सबब है कि यह सौदागर महाजनांन जमीन माता के नाम का राक्षसी पाप कराते हैं जिससे जमीन माता के शरीर का हाजमा बिगड़ गया है इससे जल खारा हो गया है; और जिसको कि तुम तमाम जहान के लोग रतनागर सागर और समुद्र-2 कहते हो वोह जमीन माता की ओझड़ी है, और जिन्हों को कि नदियां बोलते है वोह जमीन माता के शरीर की अतड़ियां है और जो कि छोटे-बड़ेनाले दिखाई देते हैं वोह जमीन माता के शरीर की नाड़े हो, जिस तरह से अपने शरीर में जिस कदर चीजें याने नाड़े वगैरा है इसी तरह से जमीन माता के शरीर में भी कुल चीजें नाड़े वगैरा है, और जबकि हम तुम लोग पानी पीते हैं तो आतों और नाड़ों के अन्दर होकर ओझड़ी में पहुँचता है; इसी तरह से इस बात को भी समझना चाहिए कि जब मेह बरसता है जब जमीन माता पानी पीती है, जब वोह बरसात का पानी नदियों के रास्ते होकर रतनागर सागर में पहुँचता है, सो सब दुनिया देखती है कि रतनागर सागर का जल खारा किया है और बलराजा के बाद से ही इन बनियों ने इन्द्रजाल का पाप चलाया है जिससे रतनागर सागर का जल खारा जहर हो गया हैं जिसकी खास वजह यह है कि जब हम तुम खाना खाते है और हजम नहीं होता है और पेटमें दरद हो जाता है, तो उस वक्त में केसी सख्ती उठानी पड़ती है और मारे तकलीफ के कुछ नहीं सुहाता है तो उसी तरह से जमीन का भी हाजमा बिगड़ गया है जिससे रतनागर सागर का जल खारा हो गया है और सिवाय इसके और किसी-2 के शरीर में बीमारी के सबब के ऐसा भी हो जाता है कि जो खाना बिलकुल हजम नहीं होता है, बलके खाना पेट में फूल जाता है तो फिर उसके पेटमें किस बला का दरद होता है कि जो बयान नहीं किया जाता है; सो बोह भी इन्द्रजाल के पाप से होता है और यह सौदागर महाजन इन्द्रजाल के पाप से सरद व गरम का भी रोग कर देते है जब रतनागर सागर दिन भर और रात भर में दो तीन मरतबा चढ़ाई करता है, तो भी दुनिया के लोग नहीं समझते हैं कि यह जमीन माता को आफरे की बीमारी का रोग किया है और पहले जमाने के आदमी देवता सरुपी थे कि जिनकी अकल को रावण ने राक्षस विद्या के पाप से कैद करदी थी, इससे दुनिया स्वर्ग को भूल गई थी और रावण ने तो स्वर्ग का राज ही ले लिया था, क्योंकि रावण स्वर्ग में ही रहता था, सो सबूत वेद व पुराणों में लिखा है कि रावण ने स्वर्ग का राज ले लिया था, परन्तु स्वर्ग और नरक तो यह जमीन माता ही है कि जो कुल जहान के लोगों को पहचान अपने राक्षसी पाप से दुनिया को भुलाई थी, क्योंकि रावण जमीन माता को हर तरह का रोह कराता था और दुनिया को नहीं मालूम होने देता था और रावण के राक्षसी पाप को ही दुनिया स्वर्ग जानती थी और जमीन की पहचान बिलकुल भुला दी थी, क्योंकि रावण ने चौरासी लाख कुण्डियां राध लहू की बनाई थी उसको स्वर्ग जानते थे और जमीन की पहचान बिलकुल भुलादी थी, कि जो रावण जमीन माता को राक्षस विद्या के जुलम से फाड़ भी देता था तो दुनिया यह नहीं जानती थी कि जमीन माता रावण के राक्षसी पाप से फटती है, बलके यह जानते थे कि परमेश्वर की कुदरत है और यह ख्याल नहीं करते थे कि यह जमीन जो फटती है यह राक्षसी पाप के जादू से फटती है, इससे जमीन माता कांपती है और इसी वजह जमीन माता के शरीर में दरद होता है, लेकिन जमीन के शरीर की पहचान तो दुनिया के लोगों को इस गरज से भुला दी थी कि जो जमीन माता को तरह-2 का रोग करुँगा तो जहान के लोगों को मेरा राक्षसी पाप का करना मालूम नहीं होगा,
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