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जगतहितकाऱणी

सो जिस दिन से कि राक्षस विद्या का पाप दुनिया के नाम से कराते हैं, उस दिन दुनिया की अकल छलामान हो जाती है सो यह टीपणे राक्षस विद्या के है, कि जिस तरह से रावण ने राक्षस विद्या के टीपने चलाये थे, इसी तरह पर इन बनियों ने भी राक्षस विद्या के टीपणे चलाये है और बामणों को मराने के वास्ते पकड़ा दिये हैं, परन्तु बामणों को तो इनके जालों की खबर नहीं कि टीपणे बनियों के चलाये हुए है, सो इन बनियों ने टीपणों के अन्दर यह कैसी चालाकी की है कि बामणों के बुजर्गों के नाम टीपणों के अन्दर लिखकर के प्रगट किये है, इससे ब्राह्मण यह जानते हैं कि यह टीपणे हमारे हैं; इससे ब्राह्मण यह जानते हैं कि यह टीपणे हमारे हैं; सो हय बामणों की भूल है क्योंकि यह टीपणे राक्षसी वेद के बनियों के बनाये हुए है और चलाये हुए है, कि जो टीपणों को ब्राह्मण लोग आज बांच रहे है, परन्तु ईन महाजनांन ने यह अकलमन्दी की है कि जो राजा बादशाह टीपणों का हाल दरियाफ्त करेंगे तो बामणों के बच्चे मारे जावेंगे, लेकिन ब्राह्मण लोग इन टीपणों का बिलकुल ख्याल नहीं करते कि इन टीपणों में ग्रह गोता तो राक्षसी वेद के मौजिब हैं, सो इस बात को बिलकुल नहीं सोचते हैं कि टीपणे हम को किसी ने राक्षसी वेद के तो नहीं पकड़ा दिये हैं? क्योंकि रावण ने छल करके राक्षसी पाप के टीपणे रखेश्वरों को पकड़ा दिये थे, सो उसी तरह से छल करके जाल के टीपने हमारे बच्चे गारत करने के वास्ते तो नहीं पकड़ा दिये हैं? सो तो बिलकुल नहीं समझते हैं, सो यह अकल फिरने का सबब है क्योंकि बुद्धि को इन्होंने राक्षसी पाप से ऐसी खराब करदी है कि  कलम से लिखा नहीं जाता, बलके बामणों को तो अब ऐसा ही सुझता है कि यह जो टीपणे हैं, कि जिन्हों को हम रोजमररा बांचते फिरते है यह हमारे घर के है, परन्तु यह नहीं जानते कि इन सौदागर महाजनांन ने जालसाजी करके राक्षसी पाप के टीपणे बनाकर के हम बामणों को पकड़ा दिये हैं कि जैसे रावण ने जालसाजी करके रखेश्वरों के हाथों में राक्षसी वेद के टीपणे पकड़ा दिये थे। यह हाल इस तरह से है कि रावण का दिल चकवे राच करने और कुल पृथ्वी पर राज करने का था, इसी तरह से इन महाजनांन ने भी बल राजा के बाद से जालसाजी करके बामणों के बच्चे मराने के वास्ते राक्षस विद्या के टीपणे पकड़ा दिये है और इनका भी मन चकवे राच करने का है। सो यह हाल इस तरह से है कि जब अकल खराब हो जाती कै जब ऐसा ही सुझता है, परन्तु यह भी गौर करने की बात है कि जो ब्राह्मण लोग टीपणों को इस जमाने में घर-2 बांचते फिरते हैं, परन्तु बांचने से कौनसा काल और कौनसा रोग वगैरा और कौनसी बातें होती है? और टीपणों में जो कहते है कि फलाने दिन तमाम साओ देश में मेह का जोग है तो उस दिन जमीन माता के नाम का पाप उन चौरासी लाख कुण्डियों के उपर बंद कर लेते है, तो ‘बिरखा’ तमाम दुनिया-जहान में हो जाता है; और जो यह महाजन लोग यह चाहें कि मेह थोड़ा बरसने देवें तो उसी वक्त जमीन माता के नाम का पाप करना शुरु कर देते हैं तो बरसते-बरसते मेह वंद हो जाता है। इसकी ऐसी मिसाल है कि जैसे आदमी खाना खाता होवे और खाते-2 उसके पेट में बहोत सख्त दरद-दुख पैदा हो जावे तो उसी वक्त वोह उस दरद की वजह से खाना-पीना बंद हो जावे, उसी तरह से जमीन माता को भी जादू से रोग कर देते हैं तो मेह बरसते-2 बंद हो जाता है, याने जमीन माता  पानी पीते-पीते रोग के सबब से बंद हो जाती है, क्योंकि जमीन की खुराक पानी है और जो टीपणों में यह लिखा हुआ है, वो लिखते है कि फलानी जगह मेह होगा और फलानी जगह मे नहीं होगा, याने फलाना खण्डखाली रहता है उस तरफ की जमीन के नामका पाप कराये जाते है और जिस खण्ड के अन्दर मेह होने का लिखते है और उस खण्ड की जमीन के नामका पाप छोड़ देते हैं तो वहाँ मेह बरसता है, कि जैसे आदमी के शरीर में एक पासे कि तरफ में दरद हो जावे और दूसरी तरफ का पासा अच्छा रहे या एक हाथ या पांव या सर या पेट पीठ में किसी तरह का दरद या रोग हो जावे और दूसरा हाथ पाँव या सर या पीठ अच्छी होवे। इसी तरह से जमीन माता के भी देह और शरीर है, और जिस तरह चसे कि आदमी के शरीर में रोग हो जावे उसी तरह से जमीन माता के शरीर में जादू चाले से यह बनिये महाजन जमीन के नाम का होम याने पाप कराते हैं और रोग व बिमारी पैदा कर देते हैं तो जमीन माता भी बीमार हो जाती है,

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